साहस

स्वयं को, समाजिक व्यवस्था को अपने अनुरूप किये बिना अपने बच्चों को एक बेहतर विकल्प या मार्ग नही दिया जा सकता।मेरे बच्चों के लिए में सोच लूँगा। उनके लिए एक अलग दुनिया निर्मित कर लूँगा ऐसा सम्भव प्रतीत नही होता दुनिया एक ही है बस सोच में फर्क है।मेरी दुनिया और आपकी दुनिया कंही से भी अलग नही है यह जिसमे हम रहते बहुत छोटी भी है और गोल भी यहाँ अक्सर हम सबकी मुलाकात होती रहती है। सब कुछ ठीक है थोड़ा और बेहतर करने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। जब भी हम कुछ करने की भावना अपने सोचने की पटल पर लाते है। उसमे लगने वाले परिश्रम का ध्यान आते ही शरीर स्थूल पड़ने लगता है।उसके बाद उसके परिणाम की चिंता मनोबल को और भी तोड़ देती है। उसके बाद तुमने कोई ऐसा रास्ता भी नही चुना जिसके विशेषज्ञ मौजूद हो। जिसके बताएं रास्ते पर चलकर मंजिल को पा ले। 
इसके लिये जरूरी है स्पष्टता। सपना जो जागती आंखों से देखा गया हो।जिसे पूरा करने के लिये परिश्रम से ज्यादा परिपक्वता और संकल्प का होना जरूरी हो। जिज्ञासा और साहस का होना भी जरूरी है।हम कोई युद्ध नही लड़ने जा रहे पर अपने क्षमताओं को परखने के लिये भी साहस की जरूरत है। हमारे लिये जरूरी है। विश्लेषण करना कि वो सभी गुण हममे कितनी मात्रा में है। यह सर्वविदित हैकि वो सभी जरूरी गुण जिनसे कुछ बेहतर किया जा सकता है। हम सभी मे है। पर कितनी मात्रा में है इसका उजागर होना बाकी है। और जैसे जैसे इन अँधेरे रास्तों को हम पार करते चलेंगे। यह सब गुण गुना में बढ़ते चलेंगे। यही कर्म की बुनियादी ढांचा हैं। परिणाम और कठनाइयों की परवाह किये बिना अपनी बुद्धिमत्ता का सजगता के साथ इस्तेमाल करते जाना ही परिपूर्णता की कुँजी है।

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