राजनीतिक परिदृश्य
यह राजनीतिक परिस्थिति कोई नया नहीं है मैं अपने 60वर्ष के राजनीतिक परिदृश्य में पहले भी यह देख चुका हूं कि यहां विपक्ष की भूमिका समाप्त हो गया। विपक्ष की भूमिका सिर्फ नाम मात्र रह गई। वे भी आज के विपक्ष की तरह दिन रात बस विरोध में लगे रहे। लेकिन तब इंदिरा गांधी जी थी जिनकी मृत्यु के बाद समीकरण बदले। जिसका फायदा विपक्ष को मिला। फिर राजीव जी उनके साथ भी दुर्घटना हुआ। और इस तरह समीकरण बदले। और सरकार के बिखरने से विपक्ष को मजबूत होने अवसर मिला। लेकिन आज का परिदृश्य अलग है तब इस देश में बिखराव और गरीबी और भ्रष्टाचार का बोलबाला अपने चरम पर था आज मोदी जी हैं बिखराव की जगह राष्ट्रवाद चरम पर है जनता गरीबी से बाहर निकल रही हैं निचले स्तर पर भ्रष्टाचार लगभग समाप्त है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सारी समस्याओं का निवारण हो गया आज की ज्वलंत समस्या है बेरोजगारी। इससे पहले कि सरकार इस समस्या को भी जड़ से उखाड़ कर देश से बाहर फेंक दे। इसको एक ज्वलंत मुद्दा बनाए। विपक्ष क्या कर रही हैं वो सरकार द्वारा किया जा रहा सभी कार्य का विरोध और आलोचना में लगा है। जबकि जनता देख और समझ रही हैं।
यह राजनीतिक परिस्थिति कोई नई नहीं है। अपने जीवन के लगभग 60 वर्षों के राजनीतिक परिदृश्य में मैंने ऐसे दौर पहले भी देखे हैं, जब विपक्ष की भूमिका लगभग समाप्त-सी हो गई थी और वह केवल नाम मात्र का विपक्ष बनकर रह गया था।
तब भी विपक्ष की स्थिति कुछ ऐसी ही थी—दिन-रात सरकार का विरोध और आलोचना।
लेकिन उस समय परिस्थितियाँ अलग थीं। देश ने इंदिरा गांधी जी जैसा सशक्त नेतृत्व देखा। उनके निधन के बाद राजनीतिक समीकरण। फिर राजीव गांधी जी के साथ हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने एक बार फिर देश की राजनीति की दिशा बदल दी। आगे चलकर सरकारों के बिखरने और राजनीतिक अस्थिरता ने विपक्ष को मजबूत होने का अवसर दिया।
लेकिन आज का राजनीतिक परिदृश्य उस समय से बहुत अलग है।
तब देश में बिखराव, गरीबी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ अपने चरम पर थीं। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में राष्ट्रवाद का भाव मजबूत हुआ है और विकास की दिशा में लगातार प्रयास हो रहे हैं। गरीबों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए अनेक योजनाएँ और प्रयास किए जा रहे हैं। निचले स्तर पर भ्रष्टाचार को कम करने की दिशा में भी बदलाव दिखाई देता है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि देश की सारी समस्याओं का समाधान हो चुका है।
हर दौर अपनी नई चुनौतियाँ लेकर आता है।
आज हमारे सामने एक ज्वलंत समस्या है—बेरोजगारी, आरक्षण और सरकारी और प्राइवेट से स्कूल में अन्तर।
और मेरा मानना है कि विपक्ष के पास इससे बड़ा मुद्दा क्या हो सकता है?
सरकार से पूछा जाए कि देश के युवाओं के लिए रोजगार के कितने अवसर पैदा हो रहे हैं। सरकार की नीतियों में कहाँ कमी है, उसे सामने लाया जाए। और सबसे महत्वपूर्ण—विपक्ष अपना समाधान देश के सामने रखे।
लेकिन यदि विपक्ष सरकार द्वारा किए जा रहे हर कार्य का केवल विरोध और आलोचना करने में ही लगा रहेगा, तो वह अपनी वास्तविक भूमिका से दूर होता चला जाएगा।
क्योंकि आज की जनता सब देख रही है।
वह सरकार का काम भी देख रही है और विपक्ष की भूमिका भी।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं होता। विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने चाहिए, गलतियों को सामने लाना चाहिए और जहाँ संभव हो, बेहतर विकल्प देश के सामने रखना चाहिए।
सिर्फ विरोध से राजनीति नहीं चलती।
जनता को विरोध नहीं, विकल्प चाहिए।
आलोचना नहीं, समाधान चाहिए।
और सबसे बढ़कर—देश के भविष्य के लिए एक स्पष्ट दिशा चाहिए।
मेरे 60 वर्षों के राजनीतिक अनुभव में मैंने एक बात सीखी है—
राजनीतिक परिस्थितियाँ कभी स्थायी नहीं होतीं। जब सरकार पूरी तरह हावी हो तो विपक्ष को जमीन पर उतर कर काम करना पड़ेगा।
समय बदलता है, समीकरण बदलते हैं और जनता का निर्णय भी बदल सकता है।
लेकिन उसके लिए मजबूत और युवा कर्मठ विपक्ष का होना जरूरी है। जो भविष्य की परिकल्पना को संभव बना सके।
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